सोमवार, 29 मई 2017

चन्द माहिया: क़िस्त 31

क़िस्त : 31

:1:

माना कि तमाशा है
कार-ए-जहाँ में सब
फिर भी इक आशा है

:2:

दरपन तो दरपन है
झूट नहीं बोले
सच बोल रहा मन है

:3:

क्या छाई घटाएं हैं
दिल है रिन्दाना
सन्दल सी हवायें हैं

:4:

जितना देखा फ़लक
उतनी ही तेरी
बातों में सच की झलक

:5:

ये कैसा नशा किस का
अब तक नै देखा
एह्सास है बस जिसका

-आनन्द.पाठक--
08800927181

बुधवार, 24 मई 2017

एक ग़ज़ल : ज़रा हट के ---ज़रा बच के--

एक मज़ाहिका ग़ज़ल :---ज़रा हट के ---ज़रा बच के---


मेरे भी ’फ़ेसबुक’ पे कदरदान बहुत हैं
ख़ातून भी ,हसीन  मेहरबान  बहुत हैं

"रिक्वेस्ट फ़्रेन्डशिप" पे हसीना ने ये कहा-
"लटके हैं पाँव कब्र में ,अरमान बहुत हैं"

’अंकल’ -न प्लीज बोलिए ऎ मेरे जान-ए-जाँ
’अंकल’, जो आजकल के हैं ,शैतान बहुत हैं

टकले से मेरे चाँद पे ’हुस्ना !’ न जाइओ
पिचके भले हो गाल ,मगर शान बहुत है

हर ’चैट रूम’ में सभी हैं जानते मुझे
कमसिन से,नाज़नीन से, पहचान बहुत है

पहलू में मेरे आ के ज़रा बैठिए ,हुज़ूर !
घबराइए नहीं ,मेरा ईमान बहुत है 

’बुर्के’ की खींच ’सेल्फ़ी’ थमाते हुए कहा 
"इतना ही आप के लिए सामान बहुत है"

’व्हाट्अप’ पे सुबह-शाम ’गुटर-गूँ" को देख कर
टपकाएँ लार शेख जी ,परेशान बहुत हैं

आदत नहीं गई है ’रिटायर’ के बाद भी
’आनन’ पिटेगा तू कभी इमकान बहुत है

बेगम ने जब ’ग़ज़ल’ सुनी ,’बेलन’ उठा लिया
’आनन मियां’-’बेलन’ मे अभी जान बहुत है

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
हुस्ना   = हसीना
इमकान = संभावना
"गुटर-गूं" = आप सब जानते होंगे नहीं तो किसी ’कबूतर-कबूतरी’ से पूछ लीजियेगा
हा हा हा

रविवार, 21 मई 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 40

चन्द माहिया : क़िस्त 40

:1:
जीवन की निशानी है
रमता जोगी है
और बहता पानी है

;2:
मथुरा या काशी क्या
मन ही नहीं चमका
घट क्या ,घटवासी क्या

:3:
ख़ुद को देखा होता
मन के दरपन में
क्या सच है ,पता होता

:4:
बेताब न हो , ऎ दिल !
सोज़-ए-जिगर तो जगा
फिर जा कर उन से मिल

:5;
ये इश्क़ इबादत है
दैर-ओ-हरम दिल में
और एक ज़ियारत है



-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
सोज़-ए-जिगर = अन्त: की अग्नि

चन्द माहिया : क़िस्त 37

चन्द माहिया : क़िस्त 37


:1:
सद ख़्वाब ,ख़यालों में
जब तक  है परदा
उलझा हूँ सवालों में 

;2:
शिकवा  न शिकायत है
मैं ही ग़लत ठहरा
ये कैसी रवायत है

:3:
तुम ने ही बनाया है 
ख़ाक से जब मुझ को 
फिर ऎब क्यूँ आया है ?

:4:
सच है इनकार नहीं
’तूर’ पे आए ,वो
लेकिन दीदार नहीं 

:5;

कहता है कहने दो
बात ज़हादत की
ज़ाहिद तक रहने दो

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
ज़हादत की बातें  = जप-तप की बातें
तूर = उस पहाड़ का नाम जहाँ पर हज़रत
मूसा ने ख़ुदा से बात की थी


शनिवार, 13 मई 2017

एक ग़ज़ल : हौसला है ,दो हथेली है -----



हौसला है ,दो हथेली है , हुनर है
किस लिए ख़ैरात पे तेरी नज़र है

आग दिल में है बदल दे तू ज़माना
तू अभी सोज़-ए-जिगर से बेख़बर है

साजिशें हर मोड़ पर हैं राहजन के
जिस तरफ़ से कारवाँ की रहगुज़र है

डूब कर गहराईयों से जब उबरता
तब उसे होता कहीं हासिल गुहर है

इन्क़लाबी मुठ्ठियाँ हों ,जोश हो तो
फिर न कोई राह-ए-मंज़िल पुरख़तर है

ज़िन्दगी हर वक़्त मुझको आजमाती
एक मैं हूं ,इक मिरा शौक़-ए-नज़र है

लाख शिकवा हो ,शिकायत हो,कि ’आनन’
ज़िन्दगी फिर भी हसीं है ,मोतबर है 

-आनन्द.पाठक-
08800927181
शब्दार्थ
सोज़-ए-जिगर = दिल की आग
राहजन  = लुटेरे [इसी से राहजनी बना है]
गुहर   = मोती
पुरख़तर = ख़तरों से भरा
शौक़-ए-नज़र =चाहत भरी नज़र

गुरुवार, 11 मई 2017

एक व्यंग्य गीत : तू मेरे ब्लाग पे आ-----


एक व्यंग्य गीत : मैं तेरे ’ब्लाग’ पे आऊँ------

[संभावित आहत जनों से क्षमा याचना सहित]-----

मैं तेरे ’ब्लाग’ पे  जाऊँ ,तू मेरे ’ब्लाग’ पे आ
मैं तेरी पीठ खुजाऊँ  , तू मेरी  पीठ  खुजा

तू क्या लिखता रहता है , ये  बात ख़ुदा ही जाने
मैने तुमको माना है  , दुनिया  माने ना माने
तू इक ’अज़ीम शायर’ है ,मैं इक ’सशक्त हस्ताक्षर
यह बात अलग है ,भ्राते ! हमको न कोई पहचाने

मैं तेरी नाक बचाऊँ ,तू मेरी नाक बचा
मैं तेरा नाम सुझाऊँ , तू मेरा नाम सुझा

कभी ’फ़ेसबुक’ पे लिख्खा जो तूने काव्य मसाला
याद आए मुझको तत्क्षण ,’दिनकर जी’-पंत-निराला
पहले भी नहीं समझा था , अब भी न समझ पाता हूँ
पर बिना पढ़े ही ’लाइक’ औ’ ’वाह’ वाह’ कर डाला

तू ’वाह’ वाह’ का प्यासा ,तू  मुझको ’दाद’ दिला
मैं तेरी प्यास बुझाऊँ , तू मेरी प्यास बुझा

कुछ खर्चा-पानी का ’जुगाड़’ तू कर ले अगर कहीं से
कुछ ’पेन्शन फंड’ लगा दे या ले ले   ’माहज़बीं’ से
हर मोड़ गली  नुक्कड़ पे  हैं हिन्दी की  ’संस्थाएँ ’
तेरा ’सम्मान’ करा दूँ ,तू कह दे , जहाँ  वहीं   से

तू  बिना हुए ’सम्मानित’ -जग से  न कहीं उठ  जा
मैं तुझ को ’शाल’ उढ़ाऊँ , तू  मुझ को ’शाल उढ़ा

कुछ हिन्दी के सेवक हैं जो शिद्दत से लिखते हैं
कुछ ’काँव’ ’काँव’ करते हैं ,कुछ ’फ़ोटू’ में दिखते हैं
कुछ सचमुच ’काव्य रसिक’ हैं कुछ सतत साधनारत हैं
कुछ को ’कचरा’ दिखता है ,कुछ कचरा-सा बिकते हैं

मैं ’कचड़ा’ इधर बिखेरूँ , तू ’कचड़ा’ उधर गिरा
 तेरी  ’जयकार ’ करूँ मैं  - तू मेरी ’जय ’  करा

[आहतजन का  संगठित और समवेत स्वर में
’आनन’ के ख़िलाफ़ --उद्गार----]

बड़ ज्ञानी  बने है फिरता -’आनन’ शायर का बच्चा
कुछ ’अल्लम-गल्लम’ लिखता- लिखने में अभी है कच्चा
’तुकबन्दी’ इधर उधर से बस ग़ज़ल समझने लगता
अपने को ’मीर’ समझता ,’ग़ालिब’ का लगता चच्चा 

इस ’तीसमार’ ’शेख चिल्ली’ की कर दें खाट खड़ी 
सब मिल कर ’आनन’ को इस ’ग्रुप’ से दें धकिया

-आनन्द.पाठक-


[नोट- माहजबीं--हर शायर की एक ’माहजबीं’ और हर कवि की एक  ’चन्द्रमुखी’ होती है -
सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते  और मैं ? न मैं शायर हूँ ,न कवि -----हा हा हा ----]

रविवार, 7 मई 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 38

चन्द माहिया : क़िस्त 38
:1:

 उनका  मैं दीवाना
देख रहें ऐसे
जैसे मैं  बेगाना

:2:
कोरी न चुनरिया है
कैसे मैं आऊँ ?
खाली भी गगरिया है

;3:
कुछ भी तो नही लेती
ख़ुशबू ,गुलशन से
फूलों का पता देती

:4:
दुनिया का मेला है
सब तो अपने ही
दिल फिर भी अकेला है

:5:
मुझको अनजाने में
लोग पढ़ेंगे कल
तेरे अफ़साने में

-आनन्द.पाठक-
08800927181